किसानों के बाद संतों ने दी आंदोलन की चेतावनी, संतों की मांग मंदिर- मठों को सरकारी प्रबंधन से मुक्त किया जाए

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नई दिल्ली:  दिल्ली के बॉर्डर पर किसान आंदोलन अभी खत्म नहीं हुआ है कि दूसरी तरफ आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की शहर में मौजूदगी के बीच साधु-संतों ने रास्ता रोकने की चेतावनी दे दी। कालकाजी मंदिर में देश भर से आए साधु, संतों ने मठ-मंदिर मुक्ति आंदोलन के लिए आह्वान किया। संतों ने एकस्वर में कहा कि हम केंद्र, राज्य सरकारों को मनाएंगे और अगर नहीं माने तो शस्त्र भी उठा सकते हैं। देश भर के कई मठों में बैठे रिसीवर से मुक्त करवाने की मांग करते हुए कई अखाड़ों, आश्रमों, मठों के साधु-संतों ने आक्रामक तेवर दिखाए। साधु-संतों ने कहा कि जब मु_ी भर किसान कुछ रास्ते रोककर जमकर बैठ गए तो सरकार को झुकना पड़ा, फिर भला साधु-संतों से ज्यादा अडिय़ल कौन होगा, जरूरत हुई तो रास्तों पर साधु-संत अपना डेरा बनाएंगे। कार्यक्रम का आयोजन अखिल भारतीय संत समिति के अध्यक्ष महंत सुरेंद्र नाथ अवधूत द्वारा किया गया। कई संतों ने यहां हुंकार भरी कि हमारा आंदोलन सफल होगा, क्योंकि हमें एक योगी का आशीर्वाद प्राप्त है। महंत अवधूत ने कहा कि अब समय आ गया है कि सभी संत समाज मिलकर मठ मन्दिरों की मुक्ति की आवाज उठाकर राज्य सरकारों पर दवाव बनाएं।

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविन्द्रपुरी, परिषद के महामंत्री महाराज राजेन्द्रदास ने कहा कि राज्य सरकारें अधिग्रहित मठ  मन्दिरों को तुरंत मुक्त कर संबधित सम्प्रदायों, सभाओं, संस्थाओं को सौंप दें। उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता अश्वनी उपाध्याय ने कहा कि इस विषय में केन्द्र सरकार को भी एक ज्ञापन देकर कहा जाएगा कि वो तुरंत राज्य सरकारों से सम्पर्क करके इस पहल को आगे बढाए, अगर राज्य सरकारें नही मानती हैं तो केन्द्रीय कानून बनाकर मठ मन्दिरों को अधिग्रहण से मुक्त कराए।  एक संत ने कहा कि जब आस्तिक सरकार सत्ता में आई तो राम मंदिर बना, लेकिन हमारा आंदोलन राम मंदिर जितना लंबा नहीं होगा क्योंकि अब सत्ता नास्तिकों के हाथ में नहीं है और अगले चुनाव से पहले आंदोलन खड़ा करेंगे। ताकि जब दोबारा सरकार बने, तब सबसे पहले मठ-मंदिरों को सरकार के कब्जे से मुक्त करने का कानून बन सके। राजेंद्र दास ने कहा हम इस आंदोलन में तन-मन-धन से साथ हैं। उन्होने कहा कि दूसरे देशों में धार्मिक स्थलों के लिए राज्य राशि देता है, जबकि हमारे यहां राज्य देवालयों और मठों के चढ़ावे पर नजर रखते हैं। उत्तराखंड में 51 मंदिरों को कब्जे में लेने वाले देवस्थानम् बोर्ड को लेकर लड़ाई जारी है और मुख्यमंत्री खामोश हैं।

साधु-संतों ने कहा कि चर्च, मस्जिदों, गुरुद्वारों की तरह ही मंदिरों को भी सरकारी कब्जे से मुक्त होना चाहिए। इस आंदोलन में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया कि बहुसंख्यकों की आस्था के केंद्र मंदिर और मठों के साथ यह अन्याय राजनीति का परिणाम है। दक्षिण भारत में मंदिरों पर सरकारी कब्जे के खिलाफ आंदोलन लगातार चल रहा है, लेकिन उत्तर भारत में यह पहला मौका है जब राष्ट्रीय स्तर पर मठ मंदिर मुक्ति आंदोलन का आगाज हुआ। राज्य स्तर पर उत्तराखंड में यह आंदोलन एक साल से जारी है। आंनन्द पीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर बालकानन्दगिरी, जूना अखाड़े के नारायणगिरी महाराज, महामण्डलेश्वर यतीन्द्रानन्दगिरी, जितेन्द्रानन्द महाराज, नवल किशोरदास महाराज सहित देश के 30 महामण्डलेश्वर पधारे।