August 12, 2022 2:12 am

कैग रिपोर्ट मे खुलासा, कर्ज के जाल मे फंसी उत्तराखंड सरकार, कैसे होगा बेड़ा पार…

देहरादून: उत्तराखंड सरकार कर्ज के जाल में बुरी तरह से फंसती जा रही है। हालात यह हैं कि अपनी जरूरतों के लिए हर साल वह जो कर्ज ले रही है, उसके 71 प्रतिशत के बराबर राशि उसे पुरानी उधारी और उस पर ब्याज को चुकाने पर खर्च करनी पड़ रही है। भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की लेखापरीक्षा रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है। शुक्रवार को विधानसभा के पटल पर  31 मार्च 2021 को समाप्त हुए वर्ष के लिए कैग की यह रिपोर्ट सदन पटल पर रखी गई। कैग ने बजट कम खर्च करने पर भी सवाल उठाए हैं। कैग रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकार द्वारा कुल उधार पर ऋण और उसके ऊपर ब्याज के पुनर्भुगतान की प्रतिशतता अधिक होने से इसका खास फायदा नहीं हो पाता है।

बकाया कर्ज में 13.66 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हो रही है। 2016-17 से 2020-21 की अवधि में राज्य सरकार ने 29168 करोड़ रुपये का ऋण लिया। 2020 तक राज्य पर 73,751 करोड़ रुपये का कर्ज था जो सकल राज्य घरेलू उत्पाद का 30.05 प्रतिशत आंकी गई। कैग का मानना है कि सरकार जो भी कर्ज लिए जा रहे हैं, उससे परिसंपत्तियों का निर्माण होना चाहिए ताकि उसका फायदा मिले। कैग ने उच्चस्तरीय ऋण को आर्थिक विकास के लिए हानिकारक माना है। ऐसी स्थिति में सरकारों पर कर बढ़ाने और खर्च घटाने का दबाव बनता है।

(राज्य सरकार पर ऋण का वर्षवार ब्योरा)

वर्ष    ऋण (करोड़ में)    पुनर्भुगतान की प्रवृत्ति (प्रतिशत)

2016-17    44,583    65.74
2017-18    51,831    68.27
2018-19    58,039    80.92
2019-20    65,982    95.98
2020-21    73,751    70.90
(नोट: कुल उधार पर ऋण और उसके ऊपर ब्याज के पुनर्भुगतान की प्रतिशतता)

अनुपूरक बजट भी लाए फिर भी बच गए 5,590 करोड़

कैग ने पाया कि 2020-21 में राज्य सरकार 53526.97 करोड़ रुपये का बजट पेश किया था। मध्य में 4,063.79 करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट भी लाया गया। लेकिन वित्तीय वर्ष के आखिर में 5,590.65 करोड़ यानी अनुपूरक प्रावधान से भी अधिक की धनराशि खर्च होने से रह गई। कैग ने इस प्रवृत्ति को ठीक नहीं माना। सरकार ने कुल 57,590.76 करोड़ रुपये में से 52,000.11 करोड़ रुपये ही खर्च किए।

निर्माण कार्यों पर नहीं खर्चे जा सके 1553 करोड़

कैग ने मूल बजट और अनुपूरक बजट में 1553 करोड़ 78 लाख रुपये का इस्तेमाल न होने पर तल्ख टिप्पणी की है। कैग ने कहा है कि धन की कमी से कुछ योजनाएं अपूर्ण रह जाती हैं। जनता को उनका फायदा नहीं मिलता। साथ ही योजनाओं की लागत भी बढ़ती है। रिपोर्ट में बताया गया कि सरकार ने अनुपूरक बजट को मिलाकर कुल 5,224.04 करोड़ रुपये का प्रावधान निर्माण योजनाओं पर खर्च करने के लिए किया, लेकिन 3,670.26 करोड़ रुपये ही खर्च कर सकी।

42 हजार करोड़ से अधिक का हिसाब नहीं दिया

वर्ष 2005-06 से 2019-20 तक की विधानसभा से पारित अनुदान से इतर खर्च की गई 42 हजार 873 करोड़ की धनराशि का अब तक हिसाब नहीं दिया गया है। कैग ने अपनी रिपोर्ट में इसका प्रमुखता से जिक्र किया है साथ ही धनराशि को विधानसभा से विनियमित कराने को कहा है। रिपोर्ट में उत्तराखंड बजट मैनुअल के हवाले से कहा गया है कि यदि वर्ष के समापन के बाद विनियोग से अधिक की धनराशि खर्च की जाती है, तो लोक लेखा समिति की सिफारिश के आधार पर विधानसभा को प्रस्तुत करके इसे नियमित किया जाना चाहिए। लेकिन वर्ष 2005-06 से 2019-20 के वर्षों में 42,873.61 करोड़ की अधिक खर्च दी गई राशि को अभी तक विधानसभा से नियमित नहीं कराया गया है। यानी विधानसभा को इस बारे में कोई हिसाब नहीं मिला है।

29 विभागों में अनुपूरक अनुदान खर्च नहीं कर पाई सरकार

प्रदेश सरकार की ओर से विभागों को उनकी आवश्यकताओं की पूरा करने के लिए अनुपूरक अनुदान से बजट जारी किया जाता है। लेकिन 29 विभागों ने अनुपूरक अनुदान खर्च ही नहीं किया है। कैग की गरिपोर्ट में अनुपूरक अनुदान को अनावश्यक बताया है। वित्तीय वर्ष 2020-21 में सरकार की ओर से 29 सरकारी महकमों को 38530 करोड़ बजट का प्रावधान किया गया। इसमें विभागो ने 34635 करोड़ की खर्च किए। सरकार ने विभागों को राजस्व व पूंजीगत मद की पूर्ति के लिए 3421 करोड़ का अनुपूरक अनुदान दिया। लेकिन वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक विभागों के पास 7316 करोड़ का बजट शेष रह गया। जो अनुपूरक अनुदान से अधिक है। कैग ने अनावश्यक अनुपूरक अनुदान देने पर सवाल खड़े किए हैं।

अधर में लटकीं 143 योजनाएं, जनता लाभ से वंचित

लोक निर्माण विभाग में 2015-16 से 31 मार्च 2021 के दौरान 143 विकास योजनाएं अधर में लटकी थीं। 614 करोड़ रुपये की लागत से बनाई जाने वाली इन योजनाओं पर 437.61 करोड़ रुपये खर्च भी हो चुके हैं, लेकिन इनमें से कोई योजना पूरी नहीं हो पाई। भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक ने अपनी रिपोर्ट में इस पर सवाल उठाया है। रिपोर्ट में पूंजीगत खर्च अवरुद्ध करने की प्रवृत्ति को सही नहीं माना गया है। कहा गया है कि विकास योजनाओं की धनराशि रोके जाने से कार्य की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। राज्य को अपेक्षित लाभ से लंबे समय तक वंचित रखता है। यानी जनता को योजनाओं का समय पर फायदा नहीं मिल पाता है।

उत्तराखंड का स्वास्थ्य में हिमालयी राज्यों से कम खर्च

उत्तराखंड राज्य में 2016-17 और 2020-21 के दौरान सकल राज्य घरेलू उत्पाद के अनुपात में उत्तर पूर्व और हिमालय राज्यों के औसत से काफी कम खर्च किया। इतना ही नहीं विकास कार्यों पर भी खर्च का अनुपात 2016-17 में उत्तराखंड में कम रहा, लेकिन 2020-21 में थोड़ा बढ़ा। स्वास्थ्य क्षेत्र में कुल खर्च के अनुपात में राज्य का खर्च हिमालयी राज्यों के औसत से कम था। सामाजिक क्षेत्र में उत्तराखंड का खर्च अधिक था और पूंजीगत खर्च के मामले में भी उत्तराखंड ने 2020-21 में उत्तरपूर्व व हिमालय राज्यों से कम खर्च किया।

(अधूरी योजनाओं का वर्ष वार ब्योरा)

वर्ष          अपूर्ण योजनाएं         लागत                  खर्च
2015-16       51                 369.55               292.27
2016-17        16                63.34                  44.51
2017-18      23                 88.24                  51.51
2018-19     43                   78.24                42.85
2019-20       09                 13.33                  5.47
2020-21            01             1.38                 1.00
(नोट: धनराशि करोड़ में है।)