May 16, 2022 5:50 pm

उत्तराखंड के इस दरगाह पर दी जाती है भूत प्रेतों को फांसी, जानिए किसका है ये मज़ार और कहाँ है ?

रुड़की : भारत में हिन्दू मुस्लिम एकता तथा आपसी सदभाव को साक्षात स्वरूप दिखाने वाले कई धार्मिक स्थल हैं चाहे वो ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह हो या बाबा रामदेवजी का रुणिचा धाम हो। ऐसा ही एक धार्मिक स्थल उत्तराखंड की देवभूमि में रुड़की के पास ही है जिन्हें हम पीरान कलियर शरीफ अथवा कलियर दरगाह साबीर पाक के नाम से भी जानते हैं। हजरत अलाऊद्दीन साबीर साहब की पाक व रूहानी दरगाह हरिद्वार से मात्र 20 किमी की दूरी पर स्थित हैं। इस दरगाह का इतिहास काफी पुराना है। यहाँ हिन्दू मुस्लिम समान भाव से अपनी मन्नते पूरी करने के लिए जियारत को आते है तथा दरगाह पर चादर चढ़ाते हैं। दरगाह से जुडी ख़ास बात यह है कि यहाँ न सिर्फ मुस्लिम समुदाय के लोग आते है बल्कि सभी धर्मों के लोग भी अपने मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए दरगाह में माथा टेकने आते हैं।

यहाँ आने वाले जायरीनो के लिए सामूहिक भोज (लंगर) का आयोजन भी होता हैं। यहाँ हर साल 12 रबी-उल-अव्वल को हर वर्ष उर्स बड़े धूमधाम से भरा जाता है जिसमें देश के दूर दराज इलाकों से लोग आते है।  इस दरगाह से जुड़ी दूसरी ख़ास बात यह है कि भूत पिशाच, बुरी आत्मा तथा रूहों से मुक्ति पाने के लिए यहाँ आने वाले जायरीनों की संख्या अधिक हैं। बताया जाता है कि साबीर पाक की दरगाह में ऐसी पारलौकिक शक्ति है जो भूत प्रेतात्माओं को फांसी दे देती हैं तथा पीड़ित व्यक्ति को उससे छुटकारा मिल जाता हैं। यहाँ की मान्यता के अनुसार दरगाह में एक बड़ा गुलर का पेड़ है जिस पर लोग अपनी अधूरी इच्छाओं को लिखकर पर्चा बांधते हैं। दरगाह में ही एक मस्जिद भी है जिसे साबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता हैं। यहाँ हर गुरूवार को कव्वाली गायन होता है जिसका सभी यात्री लुफ्त उठाते हैं। लोग अपनी जियारत के सलाम के लिए दरगाह के भीतर बने गूलर के पेड़ पर अपनी मन्नतों का धागा बांधते हैं। हजरत सय्यद मखदूम अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक रहमतुल्ला अलैह ये नाम साबीर पाक के ही है।  हज़रत मखदूम साबिर 13 वीं सदी के महान मुस्लिम औलिया / अल्लाह वाली रहे है जो बाबा फरीद के शागिर्द थे। कहा जाता है की इनके विसाल के बाद शेरशाह सूरी ने कलियर शरीफ में दरगाह का निर्माण करवाया था।

मखदूम साबीर कलियरी एक ऐसे दौर में पैदा हुए जब इस्लाम पैगम्बर की बताई बातों को भूलकर अंधकार भरे गलियारे में था। 16 रबिउल अव्लल 562 हिजरी को अफगान के हरात शहर में साबीर पाक का जन्म हुआ था। साबिर पाक के वालिद (पिता) सय्यद खानदान से थे। जिनका नाम सय्यद अब्दुर्रहीम था। जो हजरत सय्यद अब्दुल का़दिर जिलानी के पोते थे। जिनका खानदानी सिलसिला हजरत इमाम हुसैन से मिलता है। साबिर पाक की वालिदा (माता) का नाम हजरत हाजरा उर्फ जमीला खातून था। जो हजरत बाबा फरीदउद्दीन गंज शक्र की बहन थी। जिनका खानदानी सिलसिला हजरत उमर फारूख से मिलता है।

हज़रत साबीर पाक का बचपन और सब्र

साबीर पाक सब्र और संतोष को अपनी पैदाईस के साथ ही लाए थे। पैदाईस के समय से ही साबीर पाक एक दिन मां का दूध पिते थे तथा दूसरे दिन रोजा रखते थे। एक साल की उम्र के बाद साबीर एक दिन दूध पीते तथा दो दिन रोजा रखते थे। जब साबीर पाक की उम्र तीन साल हो गई तो साबीर पाक ने दुध पिना छोड दिया था। उसके बाद साबीर जौ या चने की रोटी बस नाम के लिए ही खाते थे। ज्यादातर रोजा ही रखते थे। 6 साल की उम्र में साबीर के वालिद की मृत्यु हो गई। छोटी सी उम्र में साबीर यतीम हो गए। वालिद की मृत्यु के बाद साबीर खामोश रहने लगे। बस नमाज और रोजे में लगे रहते। शोहर की जाने के बाद साबीर की वालिदा की जिन्दगी गुरबत में बितने लगी। मगर वह किसी से अपनी गुरबत के बारे में नही कहती थी। तीन तीन चार चार दिन में जो भी थोडा बहुत खाने को मिलता दोनो मां बेटे खा लेते। इस तरह साबीर और उनकी वालिदा की जिन्दगी ज्यादातर रोजे रखने में गुजरने लगी। इस गुरबत भरी जिंदगी में गुजर बसर करते हुए साबीर साब की मां को एक दिन ख्याल आया की ऐसी तंग हालत जिंदगी साबीर की परवरीश और तालिम होना बहुत मुश्किल है। इसलिए उन्होने साबीर को अपने भाई हजरत बाबा फरीदउद्दीन गंज शक्र के पास पाक पट्टन भेजने का इरादा बना लिया। (पाक पट्टन पाकिस्तान का एक शहर है। जहा आज भी बाबा फरीद की मजार है) आखिर साबीर की वालिदा साबीर को लेकर पाक पट्टन पहुच गई। उस समय साबीर की उम्र ग्यारह वर्ष थी। साबीर की वालिदा ने भाई फरीदुउद्दीन से गुजारिश की कि इस यतीम बच्चे कोअपनी गुलामी में ले लें। साबीर की वालिदा ने कहा भाई मेरा साबीर बहुत शर्मीला और खाने पीने के मामले में बहुत लापरवाह है, जरा ख्याल रखें। बाबा फरीद ने तुरंत साबीर को बुलाया और उनकी वालिदा के सामने ही साबीर को हुक्म दिया- साबीर जाओ आज से तुम लंगर के मालिक हो जाओ लंगर का इंतजाम करो और उसे तक्सीम करो। यह सुनकर साबिर पाक की वालिदा बहुत खुश है और खुशी खुशी अपने घर लौट आयी। इसके बाद साबिर पाक रोजाना अपने हुजरे से बाहर तशरीफ लाते और लंगर तक्सीम करते और फिर हुजरे में चले जाते। साबीर साब हुजरे का दरवाजा बंद करके तंन्हा रहते थे। और हमेशा यादे अल्लाह की याद में खोये रहते थे। साबीर लंगर तो तक्सीम करते थे मगर खुद नही खाते थे। किसी ने भी कभी भी उन्हें लंगर के वक्त या बाद में कुछ खाते पीते नही देखा। साबीर साहब ने तभी से इंसानी गिजा बिल्कुल छोड दी थी। उनकी जिंदगी अब रूहानी गिजा पर चल रही थी। इसी तरह साबीर ने खिदमत करते हुए बारह साल गुजर गए।

बारह साल बाद माँ का मखदूम साबीर से मिलना 

बारह साल बाद साबिर की वालिदा का मन साबिर से मिलने के लिए हुआ। उन्होने सोचा अब मेरा बेटा खा पीकर जवान हो गया होगा उससे मिललकर आती हूँ। खुशी खुशी वह साबीर से मिलने के लिए पाक पट्टन पहुची। साबिर पाक को देखते ही वह हेरत में पढ गई। खाना ना खाने की वजह से साबिर का शरीर बहुत कमजोर हो गया था। उन्होने साबिर से इस कमजोरी का कारण पूछा तो साबिर ने कहा मैने बारह साल से खाना नही खाया है। यह सुनकर साबीर की वालिदा को बडा रंज हुआ और भाई की तरफ से गुस्सा भी आया। वह तुरंत अपने भाई बाबा फरीद गंज शक्र पास गई और कहा आपने मेरे को खाना नही दिया उससे ऐसी क्या गलती हो गई थी। बाबा फरीद ने कहा बहन मैने तो तेरे बेटे को पूरे लंगर का मालिक बना दिया था। और तु खाना ना देने की बात करती है। बाबा फरीद।ने तुरंत साबिर पाक को बुलाया और पूछा यहा सुबह शाम लंगर चलता है। तमाम भूखे लोग यहा खाना खाते है। तुमने इतने समय खाना क्यो नही खाया। जबकि मैने तुम्हे पुरे लंगर का मालिक बना रखा था। इस पर साबिर साहब ने जवाब दिया आपने लंगर तक्सीम करने के लिए कहा था, न कि खाने के लिए। भान्जे की यह बात सुनकर बाबा फरीद हैरत में पड गए और भान्जे को अपने पास बुलाकर उसकी पेशानी को चुमा और कहा यह बच्चा साबिर कहलाने के लिए पैदा हुआ है। आज से यह मखदूम अलाउद्दीन अली अहमद साबिर है। तभी से आज तक इन्हे साबिर पाक के नाम से जाना जाने लगा।

साबीर पाक का निकाह और दुल्हन मे आग लग जाना

कुछ समय बाद साबिर पाक की वालिदा को साबिर के निकाह की चिन्ता हुई। साबिर की वालिदा ने अपने भाई बाबा फरीद से गुजारिश की वह अपनी बेटी खतीजा का निकाह साबिर से कर दे। बाबा फरीद ने कहा साबिर इस लायक नही है। क्योकि उन पर जज्ब और जलाल हर वक्त जारी रहता है। वो अल्लाह वाले औलिया हैं दुनियादारी से उन्हे कोई मतलब नही है । भाई के यह बात सुनकर बहन को बहुत दुख हुआ और कहने लगी आप मुझे यतीम गरीब और लाचार समझकर इन्कार कर रहे है। बहन की इन सब बातो का भाई के दिल पर गहरा असर हुआ और उन्होने अपनी बेटी खतीजा का निकाह साबिर पाक से कर दिया। जमाने के दस्तूर के मुताबिक जब रात मे साबिर की बीबी को साबिर साहब के हुजरे में भेजा गया। उस समय साबिर कलियरी नमाज में मशगूल थे। जब सलाम फेरकर आपकी नजर दुल्हन पर पडी तो जमीन से एक शोला निकला और दुल्हन जलकर राख हो गई। रात के इस वाक्या से साबिर की वालिदा को बहुत दुख हुआ वह इस सब का जिम्मेदार अपने आप को मानने लगी। इसी सदमे में उनका इन्तेकाल हो गया।

हजरत बाबा फरीदउद्दीन गंज शक्र आपके मामू भी थे और आपके पीर मुर्शिद भी थे। इन्ही से आपने खिलाफत पायी थी। बाबा फरीद ने आपको कलियर शरीफ की खिलाफत देकर अलीमुल्ला इब्दाल को आपके साथ कलियर की तरफ रवाना किया। कहते है कि साबिर पाक की आमद कलियर शरीफ में 656 हिजरी को हुई थी।हजरत ख्वाजा मख्दूम अलाउद्दीन अली अहमद साबिर की इस दूनिया से रूखस्ती 13 रबिउल अव्वल दिन पंचशंबा 690 हिजरी माना जाता है।