May 21, 2022 1:25 am

मसूरी गोली कांड के 27 साल: आंदोलनकारी बोले आज भी सपने नहीं हुए साकार, कांग्रेस-बीजेपी दोनों बराबर के जिम्मेदार…

मसूरी: पहाड़ो की रानी मसूरी की उत्तराखण्ड राज्य निर्माण में अहम भूमिका रही है। राज्य की लड़ाई में  मसूरी से ही 6 लोगो ने अपनी  शाहदत दी थी । आज भी जब  आंदोलनकारियों से इस सम्बंध में बात की गई तो उनकी आँखों मे  2 सितंबर 1994 के  उस काले दिन को याद करते हुए खौफ  औऱ  दर्द साफ  दिखाई देता हैं। 2 सितंबर 19 94 में तत्कालीन  मुलायम सरकार की पीएसी औऱ पुलिस ने मसूरी में खुलकर मौत का  तांडव किया था ,  पुलिस के इस बेरहम मौत के खेल में राय सिंह बंगरी ,हँसा धनाई ,बेलमती चौहान, मदनमोहन ममगाई , धनपत सिह औऱ बलबीर सिंह नेगी समेत  6 राज्यान्दोलनकारियो  को  अपनी जान गंवानी पड़ी थी  औऱ एक डीएसपी  उमाकान्त त्रिपाठी भी पुलिस की गोली का शिकार हुए थे जिनकी भी बाद में मौत होगई थी ।  मौत का कहर पुलिस ने बरपाया और 47  राज्यान्दोलनकारियो पर मुकद्दमा दर्ज कर बरेली जेल भेज दिया जबकि  कई आंदोलनकरियों पर सीबीआई  के तहत  उमाकान्त त्रिपाठी  की मौत का मुकद्दमा दर्ज करा दिया गया जिसमें की एक  महिला आंदोलनकारी सुभाषिनी बर्त्तवाल भी थीं।

मसूरी गोलीकांड की पूरी कहानी इस तरह है। दरअसल 1 सितंबर को खटीमा  गोलीकांड के विरोध में मसूरी के राज्यान्दोलनकारियो ने लंढोर मसूरी माल रोड होते हुए  किताबघर तक एक  मौन झुलस निकाला जिसमे महिलाएं, बच्चे औऱ  पुरुष भी शामिल थे। झूलाघर मसूरी में  भारी पुलिस फोर्स ने जँहा  राज्यान्दोलनकारियो के  धरना स्थल पर अपना कब्जा कर आंदोलनकारियों का  समान बहार फेंक दिया ,  इस कार्रवाई का  आंदोलनकारियों ने विरोध किया लेकिन पुलिस ने बलपूर्वक  एस डी एम बद्री प्रसाद जशोला की कनपट्टी पर बंदूक रख कर फायरिंग का आदेश ले लिया  जिसका विरोध तत्कालीन  डीएसपी उमाकान्त त्रिरपाठी ने भी किया था लेकिन पी ए सी औऱ उत्तरप्रदेश पुलिस की आँखों  में मानो खून सवार था, पुलिस  ने उन्हें भी धमकाया और कहा अगर  बीच मे आए तो तुम्हे भी इन आंदोलन कारियों के साथ निपटा दिया जाएगा । उस पुलिसिया कहर के चश्मदीद जाने  माने पत्रकार  विजेंद्र पुंडीर औऱ शूरवीर भण्डारी  जो पूरे आंदोलन को कवर कर रहे  थे उन्हें भी बलपूर्वक  वहां से हटा दिया गया था ,दोनोंफ़ पत्रकारों ने उस दिन को याद करते हुए बताया कि   ऐसा लग रहा था  मानो  पुलिस  आज खून की होली खेलने का प्लान बनाकर आयी  है। झूलाघर पर थोड़ी सी नोकझोंक के साथ ही  यूपी पुलिस ने आंसूगैस  के गोले दागने शुरू कर दिये औऱ  बिना देर किये गोलियां बरसानी शुरू  कर दी जिसमे वहां  अफरातफरी मच गई , लोग कुछ समझ पाते, इतने में महिला राज्यान्दोलनकारी हंसा धनाई के सर पर पुलिस ने गोली दाग दी , गोली लगते ही हंसा  धनाई के सिर  के परखच्चे उड़ गए, देखते ही देखते ,बलबीर सिंह नेगी ,मदन मोहन ममगाई, धनपत सिह ,रायसिंह बंगारी पर भी  पुलिस ने गोली चला  दी जिनकी मौके पर ही मौत हो गई।

इस गोलीकांड को देखकर डीएसपी उमाकान्त  त्रिपाठी ने पुलिस को  रोकने की कोशिश की  लेकिन उनको भी नही बख्शा गया औऱ उन्हें भी गोली लग गई । गोलीकांड की खबर  पूरे शहर में आग की तरह फैल गई जो जहां था वही से अस्पतालों औऱ  झूलाघर की तरफ दौड़ रहा था कि कही उनके अपने इस गोलीकांड का शिकार न बन गए हों, कई औऱ राज्यान्दोलनकारियो को भी  गोली लगी जिसमे एडवोकेट  राजेन्द्र पँवार  सहित कई लोग शामिल थे , उन्हें उसी वक्त दिल्ली रेफर कर दिया, समय पर इलाज मिलने से उनकी जान तो बच गई लेकिन मुकदमा ज़रूर लगा दिया गया , गोलीकांड के बाद मसूरी में 14 दिन का कर्फ़्यू लगा दिया गया औऱ रात में छापेमारी का दौर भी शुरू कर 47 आंदोनकारियो जिसमे जय प्रकाश उत्तराखण्डी, जोतसिंह गुनसोला, एस पी चमोली, देवी गोदियाल सहित कई लोग शामिल थे। सभी को पुलिस ने गिरफ्तार कर बरेली जेल  भेज दिया।  गिरफ्तारी के वक़्त पुलिस ने उन्हें इतनी बेरहमी से पीटा था की उसका दर्द और खौफ आज भी उनकी आँखों मे देखा जा सकता है।

पूरी मसूरी में  उस वक्त चारों तरफ़ सिर्फ और सिर्फ खामोशी पसरी थी।  बीच – बीच मे शहर मे पसरे इस सन्नाटे को तोड़ने के लिए हुतर बजाती हुई उत्तरप्रदेश की पुलिस की गाड़ियां दौड़ती रहती थी। दहशत का आलम ये था की डर के  मारे लोग पुलिस से छिपते छिपाते रातों के समय पैदल ही अपने गाँव का रुख कर लेते थे।  जो आंदोलनकारी बचे थे उन्हें पुलिस ढूंढती फिर रही थी, और वो सब लोग भी अपने परिचितों औऱ गाँव मे शरण लिए अपनी जान की सलामती की दुआ मांग रहे थे। इन शहादतों औऱ पुलिसिया बर्बरता के बाद 9 नवम्बर 2000 में  भारत के नक्शे में उत्तराखण्ड अलग राज्य बन गया। लोगों को लगा था अपना राज्य होगा अब बिकास का पहिया तेजी से घूमेगा लेकिन आज भी पहाड़ से पलायन जारी है, पहाड़ो पर शिक्षा, स्वाथ्य औऱ रोजगार के जो ईमानदारी से प्रयास किये जाने चाहिए थे वह आज भी नही हो पाए हैं।

देहरादून, हरिद्वार जैसे मैदानी जिलों में लोगों की भीड़ बढ़ गई जमीनों के रेट कई गुना बढ़ गए औऱ पहाड़ खाली होते चले गए। आज आंदोलनकारी मानते हैं जिन सपनों को लेकर अलग राज्य की लड़ाई लड़ी थी जिन सपनों के लिए शहीदों ने अपनी शहादत दी वो सपना आज भी अधूरा है। राजनीतिक  अस्थिरता ने इस राज्य  का बुरा हाल कर दिया है, जो लोग गाँव के प्रधान बनने लायक नहीं थे वो आज विधायक और मंत्री पाद पर आसीन हैं।  राज्य में  भाई भतीजावाद औऱ भ्रष्टाचार का बोलबाला है। सरकारें आती रही औऱ जाती रही लेकिन किसी ने भी इस ओर ध्यान नही दिया। जिन लोगों ने राज्य की लड़ाई लड़ी, इस राज्य के लिए अपने परिजनो को खोया, उन सब को हाशिए पर धकेल दिया गया, छोटे से राज्य में कई बार नेतृत्व परिवर्तन कर राज्य की जनता पर चाहे वो कांग्रेस हो या बीजेपी दोनों पार्टियों ने उत्तराखंड पर अनावश्यक बोझ ही डाला है, राज्य गठन के दो दशक बाद भी यह राज्य  शहीदों के सपनो का राज्य तो विल्कुल नही बन पाया।

 

उपेंद्र लेखवार की विशेष रिपोर्ट