इन मंत्रों से मिलेगी आपको निश्चित सफलता, पढ़िये चाणक्य नीति के ये 7 मंत्र जो दिला देंगे आपको सफलता

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न्यूज़ डेस्क: आचार्य चाणक्य की बातें आज के समय में भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि उन्होंने जो कुछ भी कहा या अपने धर्मशास्त्रों में लिखा है, वो सैद्धान्तिक नहीं, व्यवहारिक है. आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र ग्रंथ में धर्म, समाज, रिश्ते-नाते, अर्थशास्त्र, राजनीति आदि तमाम विषयों पर काफी कुछ कहा है. यदि व्यक्ति आचार्य चाणक्य की बातों का अनुसरण कर ले तो जीवन की तमाम समस्याओं का समाधान आसानी से निकाल सकता है. साथ ही जो चाहे, वो प्राप्त कर सकता है. यहां जानिए आचार्य चाणक्य द्वारा कही गई खास बातें.

  1. कामधेनुगुणा विद्या ह्ययकाले फलदायिनी, प्रवासे मातृसदृशा विद्या गुप्तं धनं स्मृतम्.

विद्या में कामधेनु के सामान गुण हैं, ये असमय में भी फल देने वाली है, विदेश में माता के सामान रक्षक और हित कारिणी होती है. इसलिए विद्या को गुप्त धन कहा जाता है.

  1. यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः, न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासस्तत्र न कारयेत्.

चाणक्य नीति अनुसार जिस देश में सम्मान न हो, आजीविका न मिले, कोई भाई-बन्धु न रहता हो और जहां विद्या यानी अध्ययन करना सम्भव न हो, ऐसे स्थान पर कभी नहीं रहना चाहिए.

  1. कालः कानि मित्राणि को देशः को व्ययागमोः, कस्याहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः.

कैसा समय है, कौन मेरे मित्र हैं, मैं किस देश में हूं, मेरी आय और खर्च कितना है, मैं कौन हूं और मुझमें कितनी शक्ति है, इन विषयों पर व्यक्ति को समय समय पर सोचते रहना चाहिए और इसके हिसाब से ही आचरण करना चाहिए.

  1. तावद् भयेषु भेतव्यं यावद्भयमनागतम्, आगतं तु भयं दृष्टवा प्रहर्तव्यमशङ्कया.

संकटों से तभी तक डरना चाहिए जब तक वे दूर हैं, लेकिन अगर संकट आपके सिर पर आकर खड़ा हो जाए तो बिना किसी संदेह के प्रहार कर देना ही उचित होता है.

  1. वित्तेन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते, मृदुना रक्ष्यते भूपः सत्स्त्रिया रक्ष्यते गृहम्.

धन से धर्म की रक्षा होती है. योग से विद्या की, कोमलता से राजा की और सती स्त्री से घर की रक्षा होती है.

  1. आलस्योपहता विद्या परहस्तं गतं धनम्, अल्पबीजहतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्.

आलस्य से विद्या नष्ट हो जाती है. दूसरे के हाथ में धन जाने से धन नष्ट हो जाता है. कम बीज से खेत और बिना सेनापति वाली सेना नष्ट हो जाती है.

  1. गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः, पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यगतो गुरुः.

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, इन तीनो वर्णों का गुरु अग्नि है. ब्राह्मण अपने अतिरिक्त सभी वर्णों का गुरु है. स्त्रियों का गुरु पति है. घर में आया हुआ अथिति सभी का गुरु होता है.