इस चुनौती से कैसे निपटेगी सरकार ? त्रिवेन्द्र भी हो चुके हैं इसका शिकार, लेकिन समस्या अब भी बरकरार …

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देहरादून: पीएम नरेंद्र मोदी के  केदारनाथ धाम  दौरे से ठीक पहले उत्तराखंड में तीर्थ पुरोहितों का विरोध शुरू हो चुका है. देवस्थानम बोर्ड को लेकर केदारनाथ समेत चारों धामों में पुरोहित आंदोलन कर रहे हैं. 5 नवंबर को पीएम मोदी के दौरे की तैयारियों का जायजा लेने पहुंच रहे बीजेपी के मंत्रियों का जोरदार विरोध हो रहा है, यहां तक कि तीर्थ से जुड़े लोगों का कहना है कि पीएम मोदी का भी विरोध किया जाएगा.

ये है पूरा मामला…

ये पूरा विवाद देवस्थानम बोर्ड को लेकर शुरू हुआ. जिसमें चारधाम समेत 50 से ज्यादा मंदिरों को शामिल किया गया था. यानी सरकार ने कहा था कि ये सभी मंदिर और चारों धाम इस बोर्ड के अधीन रहेंगे. लेकिन पुरोहितों और तीर्थों से जुड़े अन्य संतों ने इसका विरोध किया. हालांकि विरोध के बावजूद इस बोर्ड को लागू कर दिया गया. जिसे लेकर सरकार अब विरोध का सामना कर रही है.

क्या है देवस्थानम बोर्ड?

सरकार की तरफ से बताया जाता है कि देवस्थानम बोर्ड की स्थापना चारों धामों में विकास कार्यों और लोगों को सुविधाएं देने के लिए की गई. इस बोर्ड के तहत चार धाम समेत 51 मंदिरों को शामिल किया गया. चारधाम में श्रद्धालुओं को दी जाने वाली सुविधाओं को एक जगह से मॉनिटर करने के लिए इसकी जरूरत पड़ी. उत्तराखंड सरकार ने कहा था कि हम वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तरह राज्य में एक बोर्ड का गठन कर रहे हैं. सरकार का ये भी कहना था कि, मंदिरों में आने वाले करोड़ों के चढ़ावे का सही इस्तेमाल करने के लिए एक बोर्ड की जरूरत है. इसके लिए 2019 में प्रस्ताव पास कर विधानसभा में बोर्ड को मंजूरी दी गई.

पुरोहित क्यों हैं नाराज?

अब सवाल उठता है कि अगर सरकार ने ये दावा किया था कि, देवस्थानम बोर्ड सुविधाएं बेहतर करने के लिए बनाया गया तो तीर्थ पुरोहित इसका विरोध क्यों कर रहे हैं? पुरोहितों का कहना है कि इस फैसले में उनकी राय नहीं ली गई थी. साथ ही उनका कहना है कि जब 1939 से बद्री-केदार मंदिर समिति चल रही थी तो उसे हटाकर नया बोर्ड क्यों बनाया गया. नया बोर्ड बनने से चारों धामों की पूजा विधि और पारंपरिक चीजों पर असर पड़ सकता है. पुरोहितों का ये भी कहना है कि, देवस्थानम बोर्ड के बाद उनके हक और अधिकार छीने जाएंगे. जिन लोगों को इसके जरिए रोजगार मिलता है, उन पर भी असर पड़ सकता है. उनका कहना है कि चारों धामों को एक बोर्ड के अधीन नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि सभी जगह अलग-अलग पारंपरिक तरीके से पूजा होती है.

हालांकि दूसरे पक्ष का ये भी आरोप है कि तीर्थ पुरोहित करोड़ों रुपये के चढ़ावे के चलते इस बोर्ड का विरोध कर रहे हैं. क्योंकि बोर्ड बनने के बाद चारों धामों के चढ़ावे का पूरा हिसाब रखा जाएगा, साथ ही उस पैसे को खर्च भी बोर्ड के जरिए ही किया जाएगा. ऐसे में मंदिर से जुड़े लोग इसका विरोध कर रहे हैं.

त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ बना था माहौल

दरअसल उत्तराखंड में 2017 चुनावों के बाद बीजेपी सत्ता में आई और त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया. त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कई विवादित फैसले लिए, जिनमें देवस्थानम बोर्ड की स्थापना वाला फैसला भी शामिल था. साल 2020 में त्रिवेंद्र सिंह रावत ने तीर्थ पुरोहितों के भारी विरोध को दरकिनार करते हुए देवस्थानम बोर्ड को लागू कर दिया. जब 2021 में त्रिवेंद्र सिंह रावत को सीएम पद से हटाया गया तो देवस्थानम बोर्ड की स्थापना को भी इसका एक बड़ा कारण माना गया था. यही कारण है कि अब पूर्व मुख्यमंत्री बन चुके त्रिवेंद्र सिंह रावत को केदारनाथ धाम में पुरोहितों और अन्य लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा. 1 नवंबर को उनके खिलाफ जमकर यहां नारेबाजी हुई और उन्हें उलटे पांव लौटना पड़ा. ऐसा ही उत्तराखंड सरकार के मंत्रियों के साथ भी हो रहा है.

चुनावों से पहले दबाव बनाने की कोशिश

उत्तराखंड में अगले कुछ ही महीनों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. ऐसे में सरकार के सामने ये एक बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया. क्योंकि चुनाव से पहले ही दो मुख्यमंत्रियों को बदला जा चुका है और बीजेपी सरकार एंटी इनकंबेंसी का सामना कर रही है. इसीलिए चुनावों से ठीक पहले कांटों का ताज पहनने वाले पुष्कर सिंह धामी ने इस मुद्दे को शांत करने की कोशिश की. धामी ने कुर्सी संभालते ही बोर्ड पर रोक लगाई और कहा कि इस विवाद को हल करने के लिए कमेटी बनाई जाएगी.

हालांकि सरकार की ये तरकीब भी काम नहीं आई, धामी सरकार ने पुरोहितों को दो महीने का वक्त दिया था, जो 30 अक्टूबर को पूरा हो चुका है. अब एक बार फिर सरकार संतों और पुरोहितों के निशाने पर है और प्रदर्शन शुरू हो चुका है. ऐसे में अब धामी सरकार फिर से चुनावों तक इस मुद्दे को शांत कराने की पूरी कोशिश करेगी. साथ ही नफा-नुकसान का हिसाब लगाते हुए मुद्दे का हल निकाला जाएगा.