July 6, 2026 6:52 pm

उत्तराखंड में प्रतिनियुक्ति नियमों की उड़ रही धज्जियां ! मूल विभाग लौटने को तैयार नहीं अधिकारी…?

देहरादून। उत्तराखंड में प्रतिनियुक्ति व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। सरकार द्वारा प्रतिनियुक्ति की समय-सीमा और नियम तय किए जाने के बावजूद कई अधिकारी वर्षों से विभिन्न विभागों और विकास प्राधिकरणों में जमे हुए हैं। कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी अधिकारियों की मूल विभाग में वापसी नहीं हो पा रही है, जिससे कई विभागों में अधिकारियों की कमी लगातार बढ़ रही है।

हाल ही में सिंचाई विभाग ने प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत अपने अभियंताओं को मूल विभाग में वापस बुलाने के लिए शासन स्तर पर पत्राचार किया है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि जिन अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति अवधि समाप्त हो चुकी है, उन्हें तत्काल मूल विभाग में लौटना होगा। हालांकि इससे पहले भी कई बार ऐसे निर्देश जारी किए जा चुके हैं, लेकिन उनका कोई खास असर नहीं दिखा।

बताया जा रहा है कि मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए), हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण (एचआरडीए) सहित कई संस्थानों में ऐसे अधिकारी और अभियंता कार्यरत हैं, जिनकी प्रतिनियुक्ति अवधि काफी पहले समाप्त हो चुकी है। इसके बावजूद वे अब भी वहीं सेवाएं दे रहे हैं।

इसी तरह जलागम विभाग में भी अन्य विभागों से आए कई अधिकारी लंबे समय से प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत हैं। इससे मूल विभागों में अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी का असर योजनाओं और विकास कार्यों पर पड़ने लगा है।

सिंचाई विभाग के प्रमुख सचिव आर. मीनाक्षी सुंदरम ने स्वीकार किया कि कई अधिकारियों का प्रतिनियुक्ति कार्यकाल समाप्त हो चुका है। उन्होंने कहा कि यदि किसी अधिकारी को नियमानुसार प्रतिनियुक्ति का विस्तार मिला है तो वह कार्य जारी रख सकता है, लेकिन जिनका कार्यकाल पूरा हो चुका है, उन्हें नियमों के अनुसार या तो विस्तार लेना होगा अथवा मूल विभाग में वापस लौटना होगा।

वहीं, जलागम मंत्री राम सिंह कैड़ा का कहना है कि प्रतिनियुक्ति व्यवस्था प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप संचालित होनी चाहिए और नियमों का पालन सभी के लिए समान रूप से सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि बेहतर सुविधाएं, शहरी क्षेत्रों में तैनाती और बड़े प्रोजेक्ट्स में काम करने के अवसरों के कारण कई अधिकारी मूल विभाग में लौटने से बचते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि सरकार अपने ही बनाए नियमों का प्रभावी ढंग से पालन नहीं करा पा रही है, तो प्रतिनियुक्ति व्यवस्था की पारदर्शिता और उद्देश्य पर भी प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।