September 2, 2026 6:45 pm

सम्मान या वोट बैंक का खेल ? शुद्धिकरण विवाद से दलित वोट पर बढ़ी राजनीतिक जंग…!

देहरादून: हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद मंच के कथित शुद्धिकरण का मामला अब उत्तराखंड की सियासत में बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। राहुल गांधी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने के बाद कांग्रेस ने इसे दलित सम्मान और सामाजिक भेदभाव से जोड़कर भाजपा को घेरना शुरू कर दिया है। वहीं भाजपा इसे कांग्रेस की वोट बैंक की राजनीति बता रही है।

मुद्दा भले हल्द्वानी से शुरू हुआ हो, लेकिन इसकी नजर अब सीधे 2027 के विधानसभा चुनाव पर है। उत्तराखंड में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 18.76 प्रतिशत है और विधानसभा की 13 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। हालांकि दलित मतदाताओं का प्रभाव केवल आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं है। हरिद्वार, देहरादून और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों की कई सामान्य सीटों पर भी यह मतदाता वर्ग चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है।

2017 और 2022 में बदला समीकरण

उत्तराखंड के पिछले दो विधानसभा चुनाव दलित राजनीति के बदलते रुझान को समझने के लिए अहम हैं। 2017 में भाजपा ने 13 आरक्षित सीटों में से 11 पर जीत दर्ज की थी, जबकि 2022 में उसकी संख्या घटकर 9 रह गई। कांग्रेस ने 2022 में 4 आरक्षित सीटें जीतीं। इनमें हरिद्वार की ज्वालापुर, भगवानपुर और झबरेड़ा सीटों के साथ ऊधमसिंह नगर की बाजपुर सीट भी शामिल रही।

इससे साफ है कि दलित मतदाता किसी एक दल का स्थायी वोट बैंक नहीं है। क्षेत्र, स्थानीय नेतृत्व और चुनावी मुद्दों के आधार पर इस वर्ग का रुख बदल सकता है।

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 47 सीटों के साथ 44.33 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस 19 सीटों के साथ 37.91 प्रतिशत वोट पर रही थी। बहुजन समाज पार्टी ने दो सीटों के साथ 4.82 प्रतिशत वोट हासिल किए थे।

राष्ट्रीय स्तर पर भी बदला रुझान

हल्द्वानी के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के पीछे 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं। देश में अनुसूचित जाति के लिए 84 लोकसभा सीटें आरक्षित हैं। 2019 में भाजपा ने इनमें से 46 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 6 सीटें मिली थीं। 2024 में भाजपा की संख्या घटकर 30 रह गई, जबकि कांग्रेस 20 सीटों तक पहुंची।

इस बदलाव ने यह संकेत दिया कि दलित मतदाताओं का राजनीतिक रुझान पहले की तरह किसी एक दल के साथ स्थायी नहीं है। यही वजह है कि उत्तराखंड में भी कांग्रेस और भाजपा के बीच दलित मतदाताओं को लेकर राजनीतिक मुकाबला लगातार अहम होता जा रहा है।

भाजपा बोली- वोट बैंक की राजनीति, कांग्रेस ने उठाया सम्मान का मुद्दा

भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेश बंसल का कहना है कि भाजपा की विचारधारा में दलित भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है। उनका आरोप है कि कांग्रेस के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, इसलिए वह हल्द्वानी के मामले को राजनीतिक लाभ के लिए तूल दे रही है।

भाजपा प्रवक्ता नवीन ठाकुर ने भी कहा कि भाजपा का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है और कांग्रेस दलित वोट बैंक के नाम पर विवाद को राजनीतिक रंग दे रही है।

वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ दलित नेता राजकुमार का कहना है कि प्रदेश का दलित समाज पूरे मामले को देख रहा है और आगामी चुनाव में भाजपा को इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। कांग्रेस इस मुद्दे को दलित सम्मान, रोजगार, आरक्षण, शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे व्यापक सवालों से जोड़ने की कोशिश कर रही है।

2027 में असली परीक्षा

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हल्द्वानी विवाद ने कांग्रेस को भाजपा पर हमला करने का एक नया मुद्दा जरूर दिया है, लेकिन इसे सीधे दलित वोट के एकमुश्त ध्रुवीकरण के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।

2027 के चुनाव में कांग्रेस की चुनौती होगी कि वह इस मुद्दे को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित न रखकर दलित समाज के वास्तविक मुद्दों से जोड़ पाए। दूसरी ओर भाजपा के सामने चुनौती होगी कि वह कांग्रेस के बनाए दलित अस्मिता और सत्ता के नैरेटिव को कितना प्रभावी ढंग से काट पाती है।

फिलहाल इतना साफ है कि उत्तराखंड का करीब 19 प्रतिशत दलित समाज चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका रखता है। हल्द्वानी का विवाद आने वाले समय में सिर्फ एक स्थानीय राजनीतिक मामला रहता है या फिर दलित सम्मान, सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का बड़ा चुनावी मुद्दा बनता है, इसका जवाब 2027 की चुनावी जमीन पर ही मिलेगा।